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हमारा लक्ष्य

हम भारत को विश्व गुरु बनाने हेतु प्रयासरत है !!



मैथिल पर्व तिथियाँ

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कलश स्थापना

-21 सितंबर, 2017

विजयादशमी

-30 सितंबर, 2017

कोजागरामी

-05 अक्टूबर, 20177

करवा चौथ

-08 अक्टूबर, 2017

धनतेरश

-17 अक्टूबर, 2017

काली पूजा

-18 अक्टूबर, 2017

दीपावली

-19 अक्टूबर, 2017

भातृ द्वितीया

-21 अक्टूबर, 2017

छठि पूजा

-26-27 अक्टूबर, 2017

देवउठौन एकादशी

-31 अक्टूबर, 2017

विद्यापति स्मृति दिवस

-02 नवम्बर, 2017

सामा चकेबा (विसर्जन)

-03 नवम्बर 2017

विवाह पञ्चमी

-23 नवम्बर, 2017

गीता जयंती

-30 नवम्बर, 2017

मकर संक्रान्ती

-14 जनवरी, 2018

नरक निवारण चतुर्दशी

-15 जनवरी, 2018

मौनी आमावश्या

-16 जनवरी, 2018

सरस्वती पूजा

-22 जनवरी, 2018

महाशिवरात्रि

-13 फरबरी, 2018

होलिका दहन

-01 मार्च, 2018

होलीी

-02 मार्च, 2018

रामनवमी

-25 मार्च, 2018

सतुआइनी

-14 अप्रैल, 2018

अक्षय तृतीयाी

-18 अप्रैल, 2018

मैथिली दिवसी

-24 अप्रैल, 2018

वट सावित्री व्रतसी

-15 मई, 2018

गुरु पूर्णिमासी

-27 जुलाई, 2018

हमारी सेवायें

हम सामर्थ्य अनुसार सामाजिक समस्या के समाधान के लिए लिखकर,बोलकर और वैचारिक क्रांति के माध्यम से लोगों में चेतना लाने हेतु प्रयासरत है

लेख लिखकर
90%
पोस्टर से
88%
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75%
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ब्लॉग

Wednesday, 8 November 2017

ऐतिहासिक रहा तीसरा और अंतिम पर्व (शाही) स्नान

सिमरिया महाकुंभ- 2017


 ऐतिहासिक रहा तीसरा और अंतिम पर्व (शाही) स्नान

 देर शाम तक 30 लाख से अधिक श्रद्धालुओं ने लगाई डुबकी

 अश्विनी चौबे , केन्द्रीय मंत्री ने लिया तीसरे पर्व (शाही) स्नान में हिस्सा

 अब तक लगभग सवा करोड़ लोग कर चुके हैं कुंभ स्नान

 नीतीश कुमार ने किया 17 अक्टूबर को किया ध्वजारोहण

 19 और 29 अक्टूबर को हो हुआ पहला और दूसरा पर्व (शाही) स्नान

 16 नवंबर को है सिमरिया महाकुंभ का समापन

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 आदिकुंभ स्थली सिमरिधाम, बेगूसराय, बिहार. 8 नवंबर. सिमरिया महाकुंभ के तीसरे और अंतिम पर्व (शाही) स्नान ने पिछले सारे रिकार्ड तोड़ दिए. मोटे अनुमान के तौर पर देर शाम तक 30 लाख से अधिक लोगों ने कुंभ स्नान किया.तीसरे पर्व (शाही) स्नान में विशेष रूप से केन्द्रीय मंत्री अश्विनी चौबे शामिल रहे.

कई सौ वर्षों बाद पुनर्जीवित हुआ सिमरिया महाकुंभ तीसरे और अंतिम पर्व (शाही) स्नान के साथ ही समापन की ओर है. बीते 17 अक्टूबर को बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने देश भर से जुटे संत-महात्माओं की उपस्थिति में सिमरिया महाकुंभ का विधिवत उद्घाटन किया था. उन्होंने कहा था कि सिमरिया, बेगूसराय और बिहार के लोग संकल्पित हैं तो फिर सरकार भी उनके साथ है.

19 अक्टूबर दीपावली के दिन पहला पर्व (शाही) स्नान हुआ. इसमें लगभग 5 लाख की संख्या में लोग जुटे. इस बीच छठ पर्व में सिमरिया घाट पर लोगों का तांता लगा रहा. 29 अक्टूबर को अक्षय नवमी के दिन हुए दूसरे पर्व (शाही) स्नान में मोटे अनुमान के तौर पर 20 लाख के आसपास लोगो ने गंगा में डुबकी लगायी. 4 अक्टूबर को कार्तिक पूर्णिमा के मौके पर पिछले सभी रिकार्ड को तोड़ते हुए 20 लाख से अधिक लोगों ने सिमरिया के पावन तट पर स्नान किया. कार्तिक का महीना सबसे पवित्र महीना माना जाता है. इस दौरान प्रतिदिन के हिसाब से लगभग डेढ से दो लाख लोगों ने स्नान किया. वैसे तो 5 अक्टूबर को कल्पवास की शुरूआत के साथ ही कुंभ का प्रारंभ मानते है. इस तीसरे पर्व स्नान को मिल दें तो अभी तक सवा करोड से अधिक लोगों के सिमरिया महाकुंभ में स्नान करने का अनुमान है. 16 नवंबर को ध्वजोत्थान के साथ ही इस संख्या के और बढ़ने का अनुमान है.

 तीसरे पर्व (शाही) स्नान में भी द्वादश कुंभ पुनर्जागरण प्रेरणा पुरूष करपात्री अग्निहोत्री परमहंस स्वामी चिदात्मन जी महाराज की अगुआई में कुंभ शोभा यात्रा निकली. तीसरे पर्व (शाही) स्नान में विशेष रूप में दिल्ली से पधारे केन्द्रीय मंत्री अश्विनी चौबे साथ रहे.

कुंभ शोभा यात्रा में कुंभ की शान माने जाने वाले नागा साधु सबसे आगे रहे. पंच दशनाम जूना अखाड़ा से जुटे ये नागा साधु यात्रा में तलवार, भाले, त्रिशूल आदि से करतब दिखाते चले. नागा संन्यासियों का स्नान भी सबसे पहले हुआ. इनके साथ ही नागा साध्वियों का जत्था भी साथ था. नागा संन्यासियों के पीछ दंडी स्वामियों का दल था. इनके साथ ही अलग-अलग रथों पर भारत माता का चित्र, पंच देवताओं का चित्र शोभायमान था.

अखाड़ों से जुटे संन्यासियों और साधु संतों के बाद सर्वमंगला परिवार के देश भर से जुटे 56पीठाधीश्वरों के साथ कुंभ पुनर्जागरण के प्रेरणा पुरुष करपात्री अग्निहोत्री परमहंस स्वामी चिदात्मन जी महाराज चल रहे थे.सर्वमंगला परिवार के प्रधान व्यवस्थापक स्वामी चिदानंद जी महाराज. पीठाधीश्वरों में प्रयाग पीठाधीश्वर स्वामी माधवानंद जी महाराज, हरिद्वार पीठाधीश्वर स्वामी गंगानंद जी महाराज,  पुनौराधाम के स्वामी उमेशानंद जी महाराज, स्वामी नारायणा नंद जी महाराज, स्वामी प्रेम तीर्थ जी महाराज,  स्वामी सत्यानंद जी महाराज,स्वामी विभूत्यानंद जी महाराज, स्वामी सुनीलानंद जी महाराज, स्वामी उदयनानंद जी महाराज सहित देश भर से जुटे 56 पीठाधीश्वर शामिल थे.

 आठ महिला नागा संन्यासिनी तीसरे पर्व (शाही) स्नान की शोभा यात्रा में साथ रहीं. इनमें कृष्णागिरी जी, किरणगिरी जी, गिरिजागिरी, माहीगिरी, जमातिया मंहत भगवानागिरी जी, जमातिया मंहत सौहाद्रीगिरी जी, जमातिया मंहत उमागिरी जी. जमातिया मंहत त्रिजटागिरी जी शामिल हैं.       

 नागा संन्यासियों में श्री दिगंबर तोतापुरी जी महाराज, महंत विपिनपुरी जी महाराज, शंकरपुरी जी महाराज, राजुपुरी जी महाराज, विक्रमानंद सरस्वती जी महाराज, संतोषपुरी जी महाराज, अर्जुनपुरी जी महाराज, रोहितानंद सरस्वती जी महाराज, माधवानंद सरस्वती जी महाराज, अवधेशपुरी जी महाराज, संतोषगिरी जी महाराज, शिवगिरी जी महाराज, मोहनगिरी जी महाराज, लोहापुरी जी महाराज, अभिमन्युपुरी जी महाराज, गोविंदपुरी जी महाराज, श्यामपुरी जी महाराज, सुखवासीपुरी जी महाराज, महंत नागदेवपुरी जी महाराज, महंत जर्नादनगिरी जी महाराज, महंत गंगागिरी जी महाराज, थानापति राज राजेश्वरानंद गिरी जी महाराज शामिल हैं.

 नाथ संप्रदाय के संतों में महंत समुद्रनाथ जी महाराज, संजीवानंद जी महाराज, महंत शिवभरणगिरी जी महाराज, महंत नाराय़णगिरी जी महाराज, महंत बुद्धिगिरी जी महाराज, महंत पुरणगिरी जी महाराज, महंत लखनगिरी जी महाराज, महंत राकेश भारती कोतवाल जी महाराज, महंत पर्वतगिरी जी महाराज, ललितपुरी जी महाराज, भरतपुरी जी महाराज, बलरामगिरी जी महाराज, कृष्णापुरी जी महाराज, बाबूपुरी जी महाराज, सुमनपुरी जी महाराज, हनुमानपुरी जी महाराज, दिनेशपुरी जी महाराज, सेवादास जी महाराज, देवभूमि जी महाराज और संकादास जी महाराज साथ थे.
दंडी स्वामियों के दल में नैमिषारण्य से श्रीरामदेव आश्रम जी महाराज, दिनेश आश्रम जी महाराज, श्री लक्ष्यश्रेष्ठ आश्रम जी महाराज, श्री शंकर आश्रम जी महाराज, श्री सुरेश आश्रम जी महाराज, श्री शम्भू आश्रम जी महाराज,  श्री देवेन्द्राश्रम जी महाराज, श्री दयालु आश्रम जी महाराज, श्री कमलेश आश्रम जी महाराज, श्री वेद प्रकाश आश्रम जी महाराज, श्री गंगानन्द आश्रम जी महाराज, श्री किशन आश्रम जी महाराज, श्री राजेश आश्रम जी महाराज एवं श्री सीताराम आश्रम जी महाराज साथ थे. 
तीसरे पर्व स्नान को सफल बनाने के लिए कुंभ सेवा समिति और जिला प्रशासन ने पूरा जोर लगाया. कार्तिक स्नान के दिन भगदड़ की घटना और कई किलोमीटर लंबे जाम को देखते हुए और दुरूस्त व्यवस्था की तैयारी की. तीसरे पर्व स्नान के साथ ही सिमरिया का स्थान आदिकुंभ स्थली और देश के पांचवें कुंभ के रूप में देश-दुनिया में प्रमुख रूप से स्थापित हो गया है.

सिमरिया महाकुंभ- 2017 - 8 नवंबर को तीसरे पर्व (शाही) स्नान के लिए तैयार है सिमरिया

 अश्विनी चौबे लेंगे तीसरे पर्व (शाही) स्नान में हिस्सा

 अब तक लगभग एक करोड़ लोग कर चुके हैं कुंभ स्नान

 नीतीश कुमार ने किया 17 अक्टूबर को किया धव्जारोहण

 19 और 29 अक्टूबर को हो चुका है पहला और दूसरा पर्व (शाही) स्नान

 16 नवंबर को है सिमरिया महाकुंभ का समापन

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 आदिकुंभ स्थली सिमरिधाम, बेगूसराय, बिहार. 7 नवंबर. तीसरे और अंतिम पर्व (शाही) स्नान के लिए तैयार है आदिकुंभ स्थली सिमरियाधाम. कई सौ वर्षों बाद पुनर्जीवित हुआ सिमरिया महाकुंभ तीसरे और अंतिम पर्व (शाही) स्नान की तैयारी के साथ ही समापन की ओर है. तीसरे पर्व (शाही) स्नान में विशेष रूप से केन्द्रीय मंत्री अश्विनी चौबे के हिस्सा लेने की संभावना है.बीते 17 अक्टूबर को बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने देश भर से जुटे संत-महात्माओं की उपस्थिति में सिमरिया महाकुंभ का विधिवत उद्घाटन किया था. उन्होंने कहा था कि सिमरिया, बेगूसराय और बिहार के लोग संकल्पित हैं तो फिर सरकार भी उनके साथ है.

19 अक्टूबर दीपावली के दिन पहला पर्व (शाही) स्नान हुआ. इसमें लगभग 5 लाख की संख्या में लोग जुटे. इस बीच छठ पर्व में सिमरिया घाट पर लोगों का तांता लगा रहा. 29 अक्टूबर को अक्षय नवमी के दिन हुए दूसरे पर्व (शाही) स्नान में मोटे अनुमान के तौर पर 20 लाख के आसपास लोगो ने गंगा में डुबकी लगायी. 4 अक्टूबर को कार्तिक पूर्णिमा के मौके पर पिछले सभी रिकार्ड को तोड़ते हुए 20 लाख से अधिक लोगों ने सिमरिया के पावन तट पर स्नान किया. कार्तिक का महीना सबसे पवित्र महीना माना जाता है. इस दौरान प्रतिदिन के हिसाब से लगभग डेढ से दो लाख लोगों ने स्नान किया. वैसे तो 6 अक्टूबर को कल्पवास की शुरूआत के साथ ही कुंभ का प्रारंभ मानते है. इस हिसाब से अभी तक 90 लाख से एक करोड़ के आसपास लोगों ने सिमरिया महाकुंभ के दौरान स्नान करने का अनुमान है. 8 नवंबर के तीसरे और अंतिम पर्व (शाही) स्नान और 16 अक्टूबर को धव्जोत्थान के साथ ही इस संख्या के और बढ़ने का अनुमान है.

 तीसरे पर्व (शाही) स्नान में भी द्वादश कुंभ पुनर्जागरण प्रेरणा पुरूष करपात्री अग्निहोत्री परमहंस स्वामी चिदात्मन जी महाराज की अगुआई में कुंभ शोभा यात्रा निकलेगी. तीसरे पर्व (शाही) स्नान में विशेष रूप में दिल्ली से पधारे केन्द्रीय मंत्री अश्विनी चौबे साथ रहने वाले हैं.

कुंभ शोभा यात्रा में कुंभ की शान माने जाने वाले नागा साधु सबसे आगे रहेंगे. पंच दशनाम जूना अखाड़ा से जुटे ये नागा साधु यात्रा में तलवार, भाले, त्रिशूल आदि से करतब दिखाते चलेंगे. नागा संन्यासियों का स्नान भी सबसे पहले होगा. इनके साथ ही नागा साध्वियों का जत्था भी रहने वाला है. नागा संन्यासियों के पीछ दंडी स्वामियों का दल रहेगा. इनके साथ ही अलग-अलग रथों पर भारत माता का चित्र, पंच देवताओं का चित्र साथ रहने वाला है.

अखाड़ों से जुटे संन्यासियों और साधु संतों के बाद सर्वमंगला परिवार के देश भर से जुटे 56पीठाधीश्वरों के साथ कुंभ पुनर्जागरण के प्रेरणा पुरुष करपात्री अग्निहोत्री परमहंस स्वामी चिदात्मन जी महाराज रहने वाले हैं.सर्वमंगला परिवार के प्रधान व्यवस्थापक स्वामी चिदानंद जी महाराज. पीठाधीश्वरों में प्रयाग पीठाधीश्वर स्वामी माधवानंद जी महाराज, हरिद्वार पीठाधीश्वर स्वामी गंगानंद जी महाराज,  पुनौराधाम के स्वामी उमेशानंद जी महाराज, स्वामी नारायणा नंद जी महाराज, स्वामी प्रेम तीर्थ जी महाराज,  स्वामी सत्यानंद जी महाराज,स्वामी विभूत्यानंद जी महाराज, स्वामी सुनीलानंद जी महाराज, स्वामी उदयनानंद जी महाराज सहित देश भर से जुटे 56 पीठाधीश्वर शामिल रहने वाले हैं.

 आठ महिला नागा संन्यासिनी तीसरे पर्व (शाही) स्नान की शोभा यात्रा में साथ चलने वाली हैं. इनमें कृष्णागिरी जी, किरणगिरी जी, गिरिजागिरी, माहीगिरी, जमातिया मंहत भगवानागिरी जी, जमातिया मंहत सौहाद्रीगिरी जी, जमातिया मंहत उमागिरी जी. जमातिया मंहत त्रिजटागिरी जी शामिल हैं.       

 नागा संन्यासियों में श्री दिगंबर तोतापुरी जी महाराज, महंत विपिनपुरी जी महाराज, शंकरपुरी जी महाराज, राजुपुरी जी महाराज, विक्रमानंद सरस्वती जी महाराज, संतोषपुरी जी महाराज, अर्जुनपुरी जी महाराज, रोहितानंद सरस्वती जी महाराज, माधवानंद सरस्वती जी महाराज, अवधेशपुरी जी महाराज, संतोषगिरी जी महाराज, शिवगिरी जी महाराज, मोहनगिरी जी महाराज, लोहापुरी जी महाराज, अभिमन्युपुरी जी महाराज, गोविंदपुरी जी महाराज, श्यामपुरी जी महाराज, सुखवासीपुरी जी महाराज, महंत नागदेवपुरी जी महाराज, महंत जर्नादनगिरी जी महाराज, महंत गंगागिरी जी महाराज, थानापति राज राजेश्वरानंद गिरी जी महाराज शामिल हैं.

 नाथ संप्रदाय के संतों में महंत समुद्रनाथ जी महाराज, संजीवानंद जी महाराज, महंत शिवभरणगिरी जी महाराज, महंत नाराय़णगिरी जी महाराज, महंत बुद्धिगिरी जी महाराज, महंत पुरणगिरी जी महाराज, महंत लखनगिरी जी महाराज, महंत राकेश भारती कोतवाल जी महाराज, महंत पर्वतगिरी जी महाराज, ललितपुरी जी महाराज, भरतपुरी जी महाराज, बलरामगिरी जी महाराज, कृष्णापुरी जी महाराज, बाबूपुरी जी महाराज, सुमनपुरी जी महाराज, हनुमानपुरी जी महाराज, दिनेशपुरी जी महाराज, सेवादास जी महाराज, देवभूमि जी महाराज और संकादास जी महाराज रहने वाले हैं.

 दंडी स्वामियों के दल में नैमिषारण्य से श्रीरामदेव आश्रम जी महाराज, दिनेश आश्रम जी महाराज, श्री लक्ष्यश्रेष्ठ आश्रम जी महाराज, श्री शंकर आश्रम जी महाराज, श्री सुरेश आश्रम जी महाराज, श्री शम्भू आश्रम जी महाराज,  श्री देवेन्द्राश्रम जी महाराज, श्री दयालु आश्रम जी महाराज, श्री कमलेश आश्रम जी महाराज, श्री वेद प्रकाश आश्रम जी महाराज, श्री गंगानन्द आश्रम जी महाराज, श्री किशन आश्रम जी महाराज, श्री राजेश आश्रम जी महाराज एवं श्री सीताराम आश्रम जी महाराज रहने वाले हैं. 

तीसरे पर्व स्नान को सफल बनाने के लिए कुंभ सेवा समिति और जिला प्रशासन ने पूरा जोर लगाया है. कार्तिक स्नान के दिन भगदड़ की घटना और कई किलोमीटर लंबे जाम को देखते हुए और दुरूस्त व्यवस्था की आवश्यकता है. तीसरे पर्व स्नान के साथ ही सिमरिया का स्थान आदिकुंभ स्थली और देश के पांचवें कुंभ के रूप में देश-दुनिया में प्रमुख रूप से स्थापित हो जाएगा !




Monday, 30 October 2017

सिमरिया महाकुंभ का दूसरा पर्व स्नान ऐतिहासिक रूप से सफल रहा

लोक आस्था प्रमाण है
सिमरिया आदि कुंभ धाम है
सिमरिया महाकुंभ का दूसरा पर्व स्नान ऐतिहासिक रूप से सफल रहा

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 अक्षय नवमीं का पावन दिन होने के कारण रात 12 बजे के बाद से ही लोगों ने मां गंगा में स्नान करना शुरू कर दिया. सिमरिया महाकुंभ पुनर्जागरण के प्रेरणा पुरुष करपात्री अग्निहोत्री परमहंस स्वामी चिदात्मन जी महाराज के साथ निकली शोभा यात्रा में ही लाखों लोग शामिल हुए. नागा संन्यासियों का करतब देखते बनता था. दोपहर 1.30 बजे तक मोटे अनुमान के तौर पर लगभग 13-14 लाख लोगों ने स्नान किया. देर शाम तक इस संख्या के और बढ़ने की संभावना जतायी जा रही है.

Saturday, 7 October 2017

कुंभ और कल्पवास में शरीर आत्मा का संबंध-सिमरिया महाकुंभ 2017


सिमरिया कल्पवास का शुभारंभ
कुंभ और कल्पवास में शरीर आत्मा का संबंध
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भारतीय संस्कृति के नीतिकारों ने समाज को धर्म-आध्यात्म की तरफ प्रेरित रखने के लिए अचूक व्यवस्थाएं दी थीं. हम नीति के मार्ग पर चलें, प्रकृति के निकट रहें, आपसी सहयोग- समन्वय होता रहे और समाज सशक्त बना रहे पूरा विधान कुछ ऐसा था. हां मूल निहितार्थ आध्यात्मिक, सांस्कृतिक और नैतिक उन्नति थी.
कुंभ के साथ कल्पवास का विधान--------------------------------------------
कुंभ ज्योतिष के विधान से 12 वर्षों पर लगेगा यह तय था. लेकिन यह अंतराल लंबा है यह भी पता था. लिहाजा हमारे ऋषि-मुनियों ने कुंभ के पवित्र स्थानों पर हर वर्ष उसी काल में कल्पवास का विधान रखा.

जप-तप, साधना का साधन कल्पवास
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कल्पवास की कल्पना प्रकृति के निकट पवित्र वातावरण में पवन मन से कम से कम संसाधनों में जीवन यापन और ईश्वर चिंतन की अचूक व्यवस्था थी. समाज के हर वर्ग-वर्ण के लोग पूरे मास इक्ट्ठा होकर समाज का वह चित्र प्रस्तुत करते थे जो अद्भुत था. इसमें यज्ञ-हवन, जप-साधन, तप-संयम सब शामिल था. यह भी सच है कि यह वानप्रस्थ की व्यवस्था का एक प्रारूप भी था.
कुंभ-कल्पवास में आत्मा-शरीर का संबंध
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कल्पवास चूंकि कुंभ का शाश्वत प्रतिनिधि और स्थायी प्रतीक था इसका महत्व भी उसके बराबर ही रहा. धर्म-संस्कृति के जानकार कुंभ और कल्पवास में आत्मा और शरीर का संबंध देखते हैं. कुंभ आत्मा है तो कल्पवास शरीर.
कुंभ की परंपरा लुप्त हुई, कल्पवास बना रहा
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बाद के कालखंड में हमने शरीर का स्मरण रखा आत्मा को विस्मृत कर दिया. हां इतना तय है कि कुंभ के स्थानों पर कल्पवास लगता रहा. बाद में हम कई स्थानों पर कुंभ को ही संभाल नहीं पाए तो कल्पवास भी लुप्त हुआ. लेकिन तीन स्थानों पर प्रमुख रूप से कल्पवास की परंपरा बनी रही.
प्रसिद्ध रहा है सिमरिया कल्पवास
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सिमरिया का कल्पवास इनमें से एक रहा. यहां हर वर्ष कार्तिक मास में कल्पवास की परंपरा बनी रही और इसकी प्रसिद्धि और व्याप्ति भी वैसी ही रही. उत्तर प्रदेश, बिहार, झारखंड और दूसरे प्रदेशों के अलावा नेपाल तक से लोग यहां आते रहे.
सिमरिया कल्पवास का शुभारंभ
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सिमरिया में सदियों से लगने वाले कार्तिक मास के कल्पवास का शुभारंभ हो चुका है. एक तरह से कल्पवास से ही कुंभ की शुरुआत भी मानते हैं. लेकिन कुंभ संक्रांति का योग है. इस दृष्टि से 17 अक्टूबर से सिमरिया महाकुंभ का ध्वजारोहण है.

अमृत योग है महाकुंभ - सिमरिया महाकुंभ-2017


सिमरिया महाकुंभ-2017
ध्वजारोहण 17 अक्टूबर
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अमृत योग है महाकुंभ
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शरद पूर्णिमा की रात चांद से अमृत वर्षा होती है यह बात अब रहस्य नहीं है. आस्था से आगे विज्ञान के सहारे समझने वालों के लिए भी तथ्य प्रर्याप्त हैं, उपलब्ध हैं. ठीक कुछ यही होता है कुंभ योग में. कम लोगों को पता है कि कुंभ दरअसल ज्योतष में एक योग है. आकाश में यानी गोचर में जब सूर्य, चंद्रमा और वृहस्पति एक ही राशि में आते हैं तो कुंभ योग बनता है. शरद पूर्णिमा की रात के चांद से ज्यादा अमृत तत्व इस योग में उत्पन्न होता है.
रुद्रयामल तंत्र में विवरण
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इसका पूर्ण विवरण आगम के प्रमुख शास्त्र रुद्रयामल तंत्र के रुद्रयामलोक्ताअमृतीकरणप्रयोग अध्याय में दिया है. मानते हैं इस विशेष काल में जल को मंत्र प्रयोग से शोधित करें तो अमृत सा प्रभाव पैदा होता है. एक अर्थ में इसे ही समुद्र मंथन और फिर अमृत का प्रकट होना मानते हैं. यही कारण है कि कुंभ नदियों और सागर के किनारे जहां अथाह जलराशि हो वहां मनाने का विधान रहा.
नवग्रह के प्रभाव में हैं हम
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हमें यह समझ लेना चाहिए कि संपूर्ण पृथ्वी नवग्रहों के प्रभाव में पलती है. हमारे चिंतन-विचार, रूप-रंग, हाव-भाव, कद-काठी से लेकर उन्नति-अवनति और जीवन-मरण सब इन्हीं ग्रहों के हाथ में है. हमने अपनी संस्कृति में इन्हें देवता बना कर पूजा. उनकी गति को समझा, उससे तालमेल बिठाया और असर यह रहा कि जीवन सुखमय और शांतिपूर्ण था. उससे ऊपर बात यह कि प्रकृति मां है सभी बच्चों के लिए बराबर लेकिन जो बच्चा ज्यादा नजदीक रहता है स्वाभाविक रूप से उसे अधिक प्यार मिलता है.
17 अक्टूबर से सिमरिया में तुलार्क कुंभ
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17 अक्टूबर को एक ऐसा ही योग है. यह तुलार्क कुंभ है. सूर्य चंद्रमा और वृहस्पति तुला राशि में आ रहे हैं. गति के हिसाब से वृहस्पति एक राशि में एक वर्ष रहते हैं और इनका क्रम फिर से 12 वर्ष बाद आता है, सूर्य हर राशि में एक-एक महीना रहते हैं और चंद्रमा एक राशि में ढाई दिन. अर्थात 17 अक्टूबर से तीनों तुला राशि में रहेंगे. ऐसी स्थिति का अलग-अलग राशि के लोगों पर तो असर पड़ता ही है जलराशि पर समवेत असर पड़ता है. हमारे ऋषि मुनियों ने इस प्रभाव को समझते हुए ही नदियों और सागर के किनारे हर संक्राति में कुंभ का विधान रचा था.
आदि कुंभस्थली है सिमरियाधाम
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17 अक्टूबर से बिहार के मिथिलांचल में स्थित सिमरियाधाम में तुलार्क कुंभ लग रहा है. यह स्थान आदि कुंभस्थली के रूप में भी जाना जाता है क्योंकि ऐतिहासिक समुद्र मंथन इसी क्षेत्र में हुआ. यही वह स्थान भी है जहां मंथन से निकले अमृत का वितरण किया गया.
कल्पवास को मानते हैं कुंभ का अवशेष
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कल्पवास को कुंभ का अवशेष मानते हैं और सिमरिया में लगने वाला कल्पवास अनंत काल से श्रेष्ठ रहा है. अन्यान्य अनेक कारणों से भी यह स्थान देश के प्रमुख तीर्थस्थलियों में गिना जाता है. 17 अक्टूबर से शुरू होने वाले सिमरिया महाकुंभ में 19 अक्टूबर 29 अक्टूबर और 8 नवंबर को पर्व स्नान या शाही स्नान है. महाकुंभ का समापन 16 नवंबर को होगा.

Thursday, 5 October 2017

सिमरिया महाकुंभ-2017 ध्वजारोहण -17 अक्टूबर ( आधुनिक शंकर हैं स्वामी चिदात्मन )


यह तुलना एक बारगी अतिश्योक्ति लग सकती है. लेकिन हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि भारत की जिस धरती ने आदि गुरू शंकर को जन्म दिया उसकी उर्वरा शक्ति अभी भी वैसी ही है. यह धरती कभी भी अमृत पुत्रों से खाली नहीं रही. जब-जब समाज-धर्म को आवश्यकता हुई आदि गुरू शंकर जैसे कर्णधारों ने आगे आकर समाज को दिशा दी है.

एकता-अखंडता का आधार रहा कुंभ
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कुंभ भारत की एकता-अखंडता, धर्म-समाज, अर्थ-व्यापार, चिंतन-मनन इन सभी के लिए एक बड़ा आधार रहा. यह भी सच है कि आदि गुरू शंकर ने दशनामी अखाड़ा परंपरा देकर इन कुंभों फिर से मजबूत और व्यवस्थित किया. मत-मतांतरों में बंट चुके भारत के समाज को अद्वैत के सहारे एक करने का काम किया. अदि गुरू शंकर के अवदान की कोई तुलना नहीं हो सकती. लेकिन यह भी सच है कि उनके बाद आध्यात्मिक और रणनीतिक रूप से भारत को एक करने का दूसरा कोई पावन प्रयास बडे पैमाने पर नहीं हुआ.
हजारों वर्षों बाद एक प्रयास
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स्वामी चिदात्म जी महाराज ने हजारों वर्षों बाद देश के सुप्त कुंभों को फिर से जागृत करने का संकल्प लिया है. शास्त्रों से यह स्पष्ट है कि किसी समय देश में 12 स्थानों पर कुंभ का आयोजन होता था. यह प्रश्न क्यों नहीं किया जाना चाहिए कि दक्षिण में कुंभकोणम नाम कैसे पड़ा.? दरअसल तमिलनाडु के इस स्थान पर कभी कुंभ का आयोजन होता रहा. ठीक इसी तरह देश के सबसे ऊपरी भाग बद्रीकाश्रम, फिर गोवाहाटी, नीचे कुरूक्षेत्र औऱ गंगासागर, पूर्व-पश्चिम में जगन्नाथपुरी- द्वारिकापुरी और दक्षिण में कुंभकोणम औऱ रामेश्वरम ऐसे स्थान थे जहां कभी कुंभ की परंपरा रही.
रूद्रयामल तंत्र में स्पष्ट उल्लेख
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आगम के प्रमुख शास्त्र रूद्रायामल तंत्र में कुंभ स्थली के रूप में इन स्थानों का स्पष्ट उल्लेख है. ज्योतिष की दृष्टि से भी कुंभ एक योग है जो सूर्य, चंद्रमा और वृहस्पति के एक ही राशि में आने पर बनता है. प्रश्न हो सकता है कि राशियां 12, मास 12, सूर्य यानी आदित्य भी12 फिर कुंभ 4 क्यों.? दरअसल कुंभ 12 ही थे. हां यह भी सच है कि हर स्थान पर उसी भव्यता से आयोजन नहीं होता रहा होगा. गुलामी के कालखंड में यह परंपरा लुप्त भी हुई होगी.
प्रयाग कुंभ को जागृत किया हर्षवर्धन ने
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जानकार बताते हैं कि प्रयाग का सबसे बड़ा कुंभ भी किसी समय समाप्तप्राय था. प्रतापी राजा हर्षवर्धन के काल में राजा ने स्वयं अपनी समस्त संपत्ति दानकर इसे दानोत्सव नाम से फिर से शुरू किया. उज्जैन कुंभ के साथ भी कुछ ऐसा ही हुआ. फिर तो शंकराचार्य के प्रभाव में व्यवस्थाओं ने आकार लेना शुरू किया और चार कुंभ जागृत हुए लेकिन बाकी के आठ कुंभ फिर से सुप्त ही रहे.
सुप्त कुंभों के जागरण का अभियान
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हजारों वर्षों बाद स्वामी चिदात्मन जी महाराज ने इन सुप्त कुंभों के जागरण का बीड़ा उठाया. शास्त्र सम्मत विधि से इनमें से बद्रिकाश्रम, जग्गनाथपुरी, द्वारिकापुरी औऱ रामेश्वरम में कुंभ के पुनर्जागरण का पावन प्रयास हो चुका है. इनमें से पहले स्थान को छोड़ कर बाकी तीन का साक्षी मैं स्वयं हूं.
कहां हुआ समुद्र मंथन ?
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इनके अलावा कभी किसी ने इस बात की तरफ भी ध्यान नहीं दिया कि समुद्र मंथन जो हमारी संस्कृति-परंपरा का सबसे वृहत संदर्भ है उसका स्थान कहां था.? स्वामी जी ने विद्वानों से शोध करने को कहा. मिथिल विवि, दरभंगा विवि, काशी विवि और देश भर के अन्य विद्वाओं की सभा, संगोष्ठियों, विद्वत परिषद की बैठक, शास्त्रों, प्रमाणों, लोकश्रुतियों और स्मृतियों के आधार पर अब यह प्रमाणित हो चुका है कि बिहार का मिथिलांचल क्षेत्र ही इस समुद्र मंथन की केन्द्रीय भूमि रही.


सिमरिया में हुआ अमृत वितरण
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प्रमाणों से यह बात भी सामने आयी है कि सिमरिया ही वह स्थान रहा जहां मंथन के बाद निकले अमृत का वितरण हुआ. इस रूप में जानकी की भूमि मिथिलांचल का यह हिस्सा आदि कुंभ स्थली हुई. इसी सिमरिया स्थान पर 2011 में शास्त्र सम्मत विधि से अर्धकुंभ का आयोजन हो चुका है जिसमें लाखों की संख्या में लोग आए.

कल्पवास है कुंभ का अवशेष 
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इसी सिमरिया में 17 अक्टूबर 2017 को है महाकुंभ का ध्वजारोहण. आदि कुंभस्थली सिमरियाधाम कल्पवास के लिए पहले से प्रसिद्ध है. धर्म-संस्कृति के जानकार कल्पवास को कुंभ का अवशेष मानते हैं. अर्थात जहां कभी कुंभ लगता रहा. कल्पवास के अलावा साक्षात, शास्त्रीय और लोक परंपरा के ऐसे कई प्रणाम हैं जो इस स्थान पर हुए समुद्र मंथन की कथा कहते हैं.
सिमरिया महाकुंभ एक लुप्त हो गयी परंपरा के पुनर्जीवन का उत्सव है.
जीवित सभ्यताएं उत्तर तलाशती हैं
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यह एक सर्वमान्य तथ्य है कि पुनर्जन्म की पीड़ा पूर्व जन्म की प्रसव पीड़ा से कहीं अधिक होती है. क्यों-कहां-कैसे-कब जैसे हजारों प्रश्न मुंह बाए खड़े होते हैं. लेकिन जीवित औऱ जागृत सभ्यताएं इन प्रश्नों के उत्तर में ही अपनी सार्थकता तलाशती हैं. अपनी जड़ों को ढूंढने औऱ उन्हें फिर से सींचने का पराक्रम ही उसे नित-नूतन और चिर-पुरातन बनाता है. तो इतिहास के भुला दिए गए एक पन्ने के पुनर्लेखन के हम साक्षी बनें. संस्कृति की जागृति के महाअभियान के साकार करें. आइए सिमरिया चलें !

स्रोत - श्याम किशोर सहाय जी की कलम से



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